दिवाली 2025 की धूम-धाम के बीच भारत के एक छोटे-से गाँव मैल्कोट (मांड्य ज़िला, कर्नाटक) में इसका बिल्कुल उल्टा माहौल देखने को मिलता है। जहाँ पूरे देश में दीपों की रौशनी, पटाखों की चमक और उल्लास की लहर है, वहीं इस स्थान पर दिवाली का दिन शांत, गम्भीर और स्मृति-दिवस का रूप ले लेता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मैल्कोट, जिसे पारंपरिक तौर पर Thirunarayanapuram कहा जाता है, वैष्णव धर्म-परंपरा का पुराना केंद्र रहा है। यहाँ के प्रमुख मंदिरों में Cheluvanarayana Swamy Temple शामिल है।
मंदिर-शिक्षा-संस्थान व अन्य धार्मिक गतिविधियों के कारण यह स्थान विशेष माना जाता रहा है।
वह दुखद घड़ी
वहीं, इस ऐतिहासिक गाँव के उस हिस्से ने एक विभिन्न-यादगार और कष्टदायक घटना को अपने भीतर समाहित किया है। १८वीं शताब्दी के अंत में, दिल्ली-मस्कार नहीं बल्कि मांड्य जिले के इस मंदिर-केंद्र के समीप, Tipu Sultan के शासनकाल में, यहाँ की मंडयम इयेंगार (Mandyam Iyengar) ब्राह्मण-समुदाय को बड़ी संख्या में हानि पहुँचने का दावा किया गया है।
इस घटना की याद में इस समुदाय ने दिवाली के आरंभिक दिन को उत्सव का नहीं, बल्कि शोक और स्मृति-दिवस का रूप दे दिया है।
दिवाली क्यों शोक दिवस बनी?
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इस समुदाय के अनुसार, दिवाली-पूर्वा (नरक चतुर्दशी) के दिन, जब वह पूजा-अर्चना के लिए इकट्ठा हुए थे, तब सेना द्वारा हमला हुआ।
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मृतकों की संख्या “700 से 800+” के बीच बताई जाती है, जिसमें महिलाएँ व बच्चे भी शामिल थे।
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इस कारण, आज भी इस समुदाय के कुछ लोग उस दिन दीप नहीं जलाते, पटाखे नहीं फोड़ते, बल्कि मौन एवं नम्रता से याद करते हैं।
गाँव का वर्तमान स्वरूप
मैल्कोट आज भी धार्मिक तीर्थस्थान के रूप में जाना जाता है—ये मंदिर, घाट-ताल और आध्यात्मिक केंद्र हैं।
लेकिन दिवाली के दिन, इस समुदाय के लिए यह स्थान “उत्सव” नहीं, बल्कि एक “स्मरण” स्थल बन जाता है—जहाँ अँधेरे और शोक का साया रहता है।
क्या कहा-समझा जा सकता है?
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यह घटना हमें याद दिलाती है कि भारत के विविध सामाजिक-धार्मिक पृष्ठभूमियों में एक ही पर्व कई मायनों में मनाया-निगाला जा सकता है।
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जहाँ एक ओर दिवाली “प्रकाश का पर्व” है, वहीं किसी-किसी स्थान पर यह दुःख-स्मृति का दिन बन गया है।
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सामाजिक-इतिहास में दर्ज न-होने के बावजूद जन-स्मृति में यह घटना जीवित है—जैसा कि मैल्कोट में देखा जा सकता है।
निष्कर्ष
दिवाली 2025 की रौशनी के बीच, मैल्कोट की यह कहानी हमें बताती है कि “प्रकाश” का अर्थ सिर्फ आतिशबाजी या दीप नहीं है—कभी-कभी यह “याद” और “समझ” भी होती है। इस जगह पर दीप कम जलते हैं, लेकिन स्मृति अधिक जगा दी जाती है। जब आप इस पर्व पर खुशियाँ बाँट रहे होंगे, तब यह छोटा-सा गाँव शांतिपूर्वक अपनी पीड़ा याद कर रहा होगा।
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