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गौरेला-पेंड्रा-मरवाही-“मजदूर दिवस” या “मखमली दिखावा”?—थ्री स्टार होटल में आयोजन पर घिरा इंटक, उठे तीखे सवाल

INDIA SHAN TIMES 0
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही-“मजदूर दिवस” या “मखमली दिखावा”?—थ्री स्टार होटल में आयोजन पर घिरा इंटक, उठे तीखे सवाल गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। एक तरफ देशभर में मजदूर अपने हक, मेहनत और संघर्ष की पहचान के रूप में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाते हैं, वहीं दूसरी तरफ गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में इस दिन का स्वरूप ही सवालों के घेरे में आ गया है। जिला राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस (इंटक) द्वारा 1 मई 2026 को आयोजित किया जा रहा कार्यक्रम अब “मजदूरों का सम्मान” कम और “दिखावे की राजनीति” ज्यादा नजर आ रहा है। सबसे बड़ा सवाल आयोजन के स्थल को लेकर खड़ा हुआ है। जिस दिन को मजदूरों की मेहनत, पसीने और जमीनी हकीकत से जोड़ा जाता है, उसी दिन का कार्यक्रम एक लग्जरियस थ्री स्टार होटल—होटल टेंपल ट्री (गौरेला थाना के पास) में आयोजित किया जा रहा है। दोपहर 1 बजे से शुरू होने वाले इस कार्यक्रम में कांग्रेस से जुड़े नेताओं की मौजूदगी प्रस्तावित है, लेकिन जमीनी मजदूर इस “एलीट समारोह” में कहां फिट बैठते हैं, यह बड़ा सवाल बन गया है। हर साल की तरह इस साल भी इंटक इस आयोजन को करने का दावा कर रहा है, लेकिन इस बार सवाल ज्यादा तीखे हैं। क्या मजदूर दिवस अब मंच, माला और भाषणों तक सिमट गया है? क्या मजदूरों के नाम पर सिर्फ राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने का यह नया ट्रेंड बन गया है? विपक्ष ने भी इस मुद्दे को लपक लिया है। बीजेपी ने सीधे तौर पर निशाना साधते हुए कहा है कि “यह कांग्रेस की असल संस्कृति है—मजदूरों के नाम पर राजनीति और खुद ऐशो-आराम में कार्यक्रम।” बीजेपी नेताओं का कहना है कि जिन मजदूरों के नाम पर यह आयोजन हो रहा है, क्या वे इस होटल की दहलीज तक पहुंच भी पाएंगे? कटाक्ष यहीं नहीं रुकता। सवाल यह भी है कि क्या मजदूर दिवस का असली मकसद—मजदूरों की समस्याओं, उनके अधिकारों और संघर्षों पर चर्चा—इन आलीशान दीवारों के बीच संभव है? या फिर यह कार्यक्रम सिर्फ फोटो, प्रचार और राजनीतिक उपस्थिति का मंच बनकर रह जाएगा? आयोजन की जिम्मेदारी संभाल रहे इंटक के प्रदेश सचिव एवं जिला अध्यक्ष इदरीश अंसारी के नेतृत्व में यह कार्यक्रम हो रहा है। हालांकि इंटक की ओर से इसे मजदूरों के सम्मान और उनके मुद्दों पर चर्चा का मंच बताया जा रहा है, लेकिन जिस तरह का आयोजन स्थल चुना गया है, उसने इस दावे की गंभीरता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मजदूर दिवस—जो पसीने, संघर्ष और सादगी का प्रतीक माना जाता है—क्या अब लग्जरी और दिखावे के बीच खोता जा रहा है? गौरेला-पेंड्रा-मरवाही का यह आयोजन इसी सवाल के साथ कटघरे में खड़ा नजर आ रहा है

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